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 10. मन्नू भंडारी

 

श्रीमती मन्नू भंडारी का जन्म 3 अप्रैल 1931 ई० को मध्य प्रदेश में मंडसौर जिले के भानपुरा नामक ग्राम में हुआ। इनका बचपन का नाम महेंद्र कुमारी था।

 

इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- 'एक प्लेट सैलाब', 'मैं हार गई'. 'तीन निगाहों की एक तस्वीर', 'यही सच है', 'त्रिशंकु', 'आँखों देखा झूठ कहानी संग्रह: 'आपका बंटी', 'एक इंच मुसकान', 'महाभोज' उपन्यास तथा 'बिना दीवारों का घर'- नाटक ।

 


इनकी रचना - 'यही सच है' पर आधारित 'रजनीगंधा' नामक फिल्म को 1974 की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार प्राप्त हुआ। इन्हें हिंदी अकादमी दिल्ली का 'शिखर सम्मान', राजस्थान संगीत नाटक अकादमी 'व्यास सम्मान' से विभूषित किया गया तथा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा पुरस्कृत किया गया।

 

दो कलाकार

 

“ए रूनी, उठ", कहते हुए चादर खींचकर चित्रा ने सोती हुई अरुणा को झकझोर कर उठा दिया।

 

" अरे ! क्या है ?" आँखें मलते हुए तनिक खिझलाहट भरे स्वर में अरुणा ने पूछा। चित्रा उसका हाथ पकड़कर खींचती हुई ले गई और अपने नए बनाए हुए चित्र के सामने ले जाकर खड़ा करके बोली, "देख, मेरा चित्र पूरा हो गया।"

 

"ओह, तो इसे दिखाने के लिए तूने मेरी नींद खराब कर दी !"

 

"अरे, जरा इस चित्र को तो देख। न पा गई पहला इनाम तो नाम बदल देना।"

 

चित्र को चारों ओर घुमाते हुए अरुणा बोली, “किधर से देखूं, यह तो बता दे ? हज़ार बार तुझसे कहा कि जिसका चित्र बनाए, उसका नाम लिख दिया कर, जिससे गलतफ़हमी न हुआ करे, वरना तू बनाए हाथी और हम समझें उल्लू !" तसवीर पर आँखें गड़ाते हुए बोली, "किसी तरह नहीं समझ पा रही हूँ कि चौरासी लाख योनियों में से आखिर यह किस जीव की तसवीर है ?"

 

" तो आपको यह कोई जीव नजर आ रहा है ? जरा अच्छी तरह देख और समझने की कोशिश कर।"

 

'अरे, यह क्या ? इसमें तो सड़क, आदमी, ट्राम, बस, मोटर, मकान सब एक दूसरे पर चढ़ रहे हैं। मानो सबकी खिचड़ी पकाकर रख दी हो। क्या घनचक्कर

 

बनाया है ?" यह कहकर अरुणा ने चित्र रख दिया।

 

"जरा सोचकर बता कि यह किसका प्रतीक है ?"

 

"तेरी बेवकूफ़ी का । आई है बड़ी प्रतीकवाली।"

 

'अरे जनाब, यह चित्र आज की दुनिया में 'कन्फ्यूजन' का प्रतीक है, समझी।"

 

'मुझे तो तेरे दिमाग़ के कन्फ्यूजन का प्रतीक नजर आ रहा है, बिना मतलब जिंदगी ख़राब कर रही है।" और अरुणा मुँह धोने के लिए बाहर चली गई। लौटी जो देखा तीन-चार बच्चे उसके कमरे के दरवाजे पर खड़े उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आते ही बोली, " आ गए, मैं अभी आई अंदर पाल रखे हैं तूने?" फिर जरा हँसकर चित्रा बोली, "एक दिन पकाना होगा। लोगों को दिखाया करेंगे कि हमारी एक मित्र

 

साहिया थी जो बस्ती के चौकीदारों, नौकरों और चपरासियों के बच्चों की पदा

 

पढ़ाकर ही अपने को भारी पंडिताइन और समाज सेविका समझती थीं।" चार बजते ही कॉलेज से सारी लड़कियों लौट आईं, पर अरुणा नहीं लौटी। चित्रा चाय के लिए उसकी प्रतीक्षा कर रही थी।

 

"पता नहीं, कहाँ-कहाँ भटक जाती है, बस इसके पीछे बैठे रहो।" 'अरे, क्यों बड़-बड़ कर रही है ? ले, मैं आ गई। चल, बना चाय।" मिलकर 14 ही पिएँगी।

 

"तेरे मनोज की चिट्ठी आई है। "

 

अरुणा लिफ़ाफ़ा फाड़कर पत्र पढ़ने लगी। जब उसका पत्र समाप्त हो गया तो 'चाय पीते-पीते चित्रा बोली, " आज पिताजी का भी पत्र आया है, लिखा है जैसे ही यहाँ कोर्स समाप्त हो जाए, मैं विदेश जा सकती हूँ। मैं तो जानती थी, पिताजी कभी मना नहीं करेंगे।"

 

"हाँ भाई ! धनी पिता की इकलौती बिटिया ठहरी। तेरी इच्छा कभी टाली जा सकती है ? पर सच कहती हूँ मुझे तो सारी कला इतनी निरर्थक लगती है, इतनी बेमतलब लगती है कि बता नहीं सकती। किस काम की ऐसी कला, जो आदमी को आदमी न रहने दे।" अरुणा आवेश में बोली।

 

"तो तू मुझे आदमी नहीं समझती, क्यों ?"

 

"तुझे दुनिया से कोई मतलब नहीं, दूसरों से कोई मतलब नहीं, बस चौबीस घंटे अपने रंग और तूलिकाओं में डूबी रहती है। दुनिया में कितनी बड़ी घटना घट जाए, पर यदि उसमें तेरे चित्र के लिए आइडिया नहीं तो तेरे लिए वह घटना कोई महत्त्व नहीं रखती। हर घड़ी, हर जगह और हर चीज़ में तू अपने चित्रों के लिए मॉडल खोजा करती है। कागज़ पर इन निर्जीव चित्रों को बनाने के बजाय दो-चार की जिंदगी क्यों नहीं बना देती! तेरे पास सामर्थ्य है, साधन हैं!""वह काम तो तेरे लिए छोड़ दिया। मैं चली जाऊँगी तो जल्दी से सारी दुनिया का कल्याण करने के लिए झंडा लेकर निकल पड़ना !" और चित्रा हँस पड़ी।

 

तीन दिन से मूसलधार वर्षा हो रही थी। रोज अखबारों में बाढ़ की ख़बरें आती थी। बाढ़ पीड़ितों की दशा बिगड़ती जा रही थी और वर्षा थी कि थमने का नाम नहीं लेती थी। अरुणा सारा दिन चंदा इकट्ठा करने में व्यस्त रहती। एक दिन आखिर चित्रा ने कह दिया, "तेरे इम्तिहान सिर पर आ रहे हैं, कुछ पढ़ती- लिखती हैं नहीं, सारा दिन बस भटकती रहती है। माता-पिता क्या सोचेंगे कि इतना पैसा बेकार ही पानी में बहाया।"

 

“आज शाम को स्वयंसेवकों का एक दल जा रहा है, प्रिंसिपल से अनुमति ले ली है। मैं भी उनके साथ ही जा रही हूँ।" चित्रा की बात को बिना सुने उसने कहा।

 

शाम को अरुणा चली गई। पंद्रह दिन बाद वह लौटी तो उसकी हालत काफ़ी खस्ता हो रही थी। सूरत ऐसी निकल आई थी मानो छह महीने से बीमार हो । चित्रा उस समय 'गुरुदेव' के पास गई हुई थी। अरुणा नहा-धोकर, खा-पीकर लेटने लगी तभी उसकी नजर चित्रा के नए चित्रों की ओर गई। तीन चित्र बना रखे थे। तीनों बाढ़ के चित्र थे। जो दृश्य वह अपनी आँखों से देखकर आ रही थी, वैसे ही दृश्य यहाँ भी अंकित थे। उसका मन जाने कैसा कैसा हो गया।

 

शाम को चित्रा लौटी तो अरुणा को देखकर बड़ी प्रसन्न हुई ।

 

"क्यों चित्रा! तेरा जाने का तय हो गया ?"

 

"हाँ, अगले बुध को मैं घर जाऊँगी और बस एक सप्ताह बाद हिंदुस्तान की सीमा के बाहर पहुँच जाऊँगी।" उल्लास उसके स्वर में छलका पड़ रहा था। "सच कह रही है, तू चली जाएगी चित्रा ! छह साल से साथ रहते-रहते यह

 

बात मैं तो भूल गई कि कभी अलग भी होना पड़ेगा। तू चली जाएगी तो मैं कैसे रहूँगी ?" उदासी भरे स्वर में अरुणा ने पूछा। लगा जैसे स्वयं से ही पूछ रही हो। कितना स्नेह था दोनों में ! सारा होस्टल उनकी मित्रता को ईर्ष्या की दृष्टि से आज चित्रा को जाना था। अरुणा सवेरे से ही उसका सारा सामान ठीक कर रही थी। एक-एक करके चित्रा सबसे मिल आई। बस, गुरु जी से मिलना रह गया था सी उनका आशीर्वाद लेने चल पड़ी। तीन बज गए थे पर वह लौटी नहीं। पाँच बजे की गाड़ी से वह जाने वाली थी। अरुणा ने सोचा वह खुद जाकर देख आए कि आखिर बात क्या हो गई। तभी बड़बड़ाती-सी चित्रा ने प्रवेश किया, “बड़ी देर हो गईं ना। अरे क्या करूँ, बस कुछ ऐसा हो गया कि रुकना ही पड़ा।"

 

"आखिर क्या हो गया ऐसा, जो रुकना ही पड़ा, सुनें तो!" दो-तीन कंठ एक साथ बोले। " गर्ग स्टोर के सामने पेड़ के नीचे अकसर एक भिखारिन बैठी रहा करती थी ना, लौटी तो देखा कि वह वहीं मरी पड़ी है और उसके दोनों बच्चे उसके सुखे शरीर से चिपककर बुरी तरह से रो रहे हैं। जाने क्या था उस सारे दृश्य में कि मैं अपने को रोक नहीं सकी। एक रफ-सा स्केच बना ही डाला। बस, इसी में देर हो गई। "

 

साढ़े चार बजे चित्रा होस्टल के फाटक पर आ गई पर तब तक अरुणा का कहीं पता नहीं था। बहुत सारी लड़कियाँ उसे छोड़ने स्टेशन तक भी गई, पर चित्रा की आँखें बराबर अरुणा को ढूँढ़ रही थीं। पाँच भी बज गए, रेल चल पड़ी पर अरुणा न आई, सो न आई।

 

विदेश जाकर चित्रा तन-मन से अपने काम में जुट गई। उसकी लगन ने उसकी कला को निखार दिया। विदेश में उसके चित्रों की धूम मच गई। भिखारिन और दो अनाथ बच्चों के उस चित्र की प्रशंसा में तो अख़बारों के कॉलम के कॉलम भर गए। शोहरत के ऊँचे कगार पर बैठे, चित्रा जैसे अपना पिछला सब कुछ भूल पहले वर्ष तो अरुणा से पत्र व्यवहार बड़े नियमित रूप से चला, फिर कम होते-होते एकदम बंद हो गया। पिछले एक साल से तो उसे यह भी मालूम नहीं कि वह कहाँ है ? अनेक प्रतियोगिताओं में उसका 'अनाथ' शीर्षकवाला चित्र प्रथम पुरस्कार पा चुका था। जाने क्या था उस चित्र में, जो देखता चकित रह जाता। तीन साल बाद जब वह भारत लौटी तो बड़ा स्वागत हुआ उसका। अखबारों में उसकी कला पर, उसके जीवन पर अनेक लेख छपे। पिता अपनी इकलौती बिटिया की इस सफलता पर बहुत प्रसन्न थे। दिल्ली में उसके चित्रों की प्रदर्शनी का विराट आयोजन किया गया। उद्घाटन करने के लिए चित्रा को ही बुलाया गया। उस भीड़-भाड़ में अचानक उसकी भेंट अरुणा से हो गई। 'रुनी' चित्रा भीड़ की उपस्थिति को भूलकर अरुणा के गले से लिपट गई।

 

"तुझे कब से चित्र देखने का शौक हो गया, रूनी ?"

 

"चित्रों को नहीं, चित्रा को देखने आई थी। तू तो एकदम भूल ही गई।"

 

"अरे, ये बच्चे किसके हैं ?" दो प्यारे से बच्चे अरुणा से सटे खड़े थे। लड़के की उम्र दस साल की होगी तो लड़की की कोई आठ ।

 

"मेरे बच्चे हैं, और किसके । ये तुम्हारी चित्रा मौसी हैं, नमस्ते करो, अपनी मौसी को।" अरुणा ने आदेश दिया।

 

बच्चों ने बड़े आदर से नमस्ते किया। पर चित्रा अपाक होकर कभी बच्चों को और कभी अरुणा का मुँह देख रही थी। तभी अरुणा ने टोका, "कैसी मौसी है, प्यार तो कर!" और चित्रा ने दोनों के सिर पर हाथ फेरा प्यार का अरुणा ने कहा, "तुम्हारी ये मौसी बहुत अच्छी तसवीरें बनाती हैं, ये सारी तसवीरें इन्हीं की बनाई

 

हुई हैं।" 'आप हमें सब तसवीरें दिखाएँ मौसी, " बच्चे ने फ़रमाइश की। चित्रा उन्हें तसवीरें दिखाने लगी। घूमते-घूमते वे उसी भिखारिनवाली तसवीर के सामने आ

 

पहुँचे। चित्रा ने कहा, "यही वह तसवीर है रूनी ! जिसने मुझे इतनी प्रसिद्धि दी।"

 

"ये बच्चे रो क्यों रहे हैं मौसी ?" तसवीर को ध्यान से देखकर बालिका ने पूछा। " इनकी माँ मर गई है। देखती नहीं, मरी पड़ी है। इतना भी नहीं समझती!”

 

बालक ने मौका पाते ही अपने बड़प्पन और ज्ञान की छाप लगाई।

 

"ये सचमुच के बच्चे थे, मौसी ?" बालिका का स्वर करुण-से-करुणतर होता जा रहा था।

 

'और, सचमुच 44 के बच्चों को देखकर ही तो बनाई थी यह तसवीर।"

 

"मौसी, हमें ऐसी तसवीर नहीं, अच्छी-अच्छी तसवीरें दिखाओ, राजा-रानी की, परियों की।"

 

उस तसवीर को और अधिक देर तक देखना बच्चों के लिए असहय हो उठा था। तभी अरुणा के पति आ पहुँचे। साधारण बातचीत के पश्चात् अरुणा ने दोनों बच्चों को उनके करते हुए कहा, "आप ज़रा बच्चों को प्रदर्शनी दिखाइए, मैं चित्रा को लेकर घर चलती हूँ।"देखता था।

बच्चे इच्छा न रहते हुए भी पिता के साथ विदा हुए। चित्रा को दोनों बच्चे बड़े ही प्यारे लगे। वह उन्हें देखती रही। जैसे ही वे आँखों से ओझल हुए उसने पूछा, "सच सच बता रूनी, ये प्यारे-प्यारे बच्चे किसके हैं ?"

 


"कहा तो, मेरे।" अरुणा ने हँसते हुए कहा।

 😀🍒

'अरे बता ना, मुझे ही बेवकूफ़ बनाने चली है।"

 

एक क्षण रुककर अरुणा ने कहा, "बता दूँ ?" और फिर उस भिखारिनवाले चित्र के दोनों बच्चों पर उगुली रखकर बोली, "ये ही वे दोनों बच्चे हैं।"

 

" क्या....!" चित्रा की आँखें विस्मय' से फैली रह गई।

 

" क्या सोच रही है चित्रा ?"

 

. मैं.... कि......." पर शब्द शायद उसके विचारों ."कुछ नहीं..... मैं...... सोच रही थी कि ........

 

में खो गए।

 

- मन्नू भंडारी

 

4. आश्चर्य, हैरानी👇👮👇

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